महाराष्ट्र बजट 2026-27: 7.69 लाख करोड़ का भारी बजट, लेकिन अल्पसंख्यकों की झोली खाली: 0.5% फंड भी नहीं मिला

मुंबई: महाराष्ट्र सरकार द्वारा पेश किया गया साल 2026-27 का बजट आंकड़ों का खेल और हकीकत से दूर नजर आता है। बजट के गहरे विश्लेषण से यह साफ पता चलता है कि राज्य की तरक्की के दावों के बीच अल्पसंख्यकों (अकलियतों) को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है। 7,69,467 करोड़ रुपये के भारी-भरकम कुल बजट में से ‘अल्पसंख्यक विकास विभाग’ को सिर्फ 844.48 करोड़ रुपये दिए गए हैं। यह रकम कुल बजट के आधे प्रतिशत (0.5%) हिस्से के बराबर भी नहीं है, जबकि राज्य में अल्पसंख्यकों की 10-12 % आबादी है। दूसरे विभागों के मुकाबले अल्पसंख्यकों को दी गई प्राथमिकता सबसे नीचे है। जहाँ ‘महिला एवं बाल विकास’ के लिए 24,231 करोड़ रुपये और ‘ओबीसी कल्याण’ के लिए 4,542 करोड़ रुपये रखे गए हैं, वहीं मुस्लिम अल्पसंख्यकों की शिक्षा और रोजगार के हिस्से में 1,000 करोड़ भी नहीं आए। यह भेदभाव साफ दिखाता है कि सरकार की प्राथमिकताओं में अल्पसंख्यकों का विकास सबसे नीचे है।

धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण के मामले में भी सरकार का भेदभाव वाला रवैया सामने आया है। बजट भाषण में 5 ज्योतिर्लिंगों, पंढरपुर और महानुभाव पंथ जैसे धार्मिक स्थलों के लिए भारी फंड और विशेष अधिकारी नियुक्त करने का जिक्र तो है, लेकिन दरगाहों की सुरक्षा, वक्फ बोर्ड की जमीनों के बचाव या मुस्लिम तीर्थ क्षेत्रों के विकास के लिए किसी ठोस पैकेज की बात तक नहीं की गई। इसके अलावा राज्य की आर्थिक हालत भी बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है। साल 2026-27 के लिए राजस्व घाटा 40,552 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 1,50,491 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार की कमाई कम है और रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी वह भारी कर्ज पर टिकी है, जिसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ेगा।

रोजगार और शिक्षा के मामले पर भी यह बजट युवाओं को मायूस करने वाला है। सरकार 2047 तक ‘विकसित महाराष्ट्र’ का सपना तो दिखा रही है, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए महज 686.40 करोड़ रुपये और कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) के लिए सिर्फ 839.28 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। मुस्लिम बस्तियों में स्किल सेंटर और तकनीकी शिक्षा की जरूरत को पूरी तरह भुला दिया गया है। इसी तरह ‘कृषि समृद्धि योजना’ के तहत खेती की लागत में 25% कमी का दावा सिर्फ एआई (AI) और टेक्नोलॉजी के भरोसे करना जमीनी हकीकत से कोसों दूर लगता है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मुस्लिम किसानों और मजदूरों के लिए बजट में किसी भी खास मदद का जिक्र न होना सरकार की बेरुखी को दर्शाता है।

अगर आंकड़ों का हिसाब देखें तो साल 2026-27 के कुल योजना खर्च 2,75,626 करोड़ रुपये में से अनुसूचित जाति और जनजाति की योजनाओं को हटाकर जो सामान्य बजट बचता है, उसमें भी अल्पसंख्यकों का हिस्सा न के बराबर है। 10 से 12 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्य में 844 करोड़ रुपये देना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। प्रति व्यक्ति खर्च के हिसाब से यह राशि इतनी कम है कि इससे शिक्षा और छात्रवृत्ति की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो सकतीं। यह बजट सिर्फ सुर्खियां बटोरने की कोशिश है। 7 लाख 69 हजार करोड़ के बजट में अल्पसंख्यकों के लिए 1% फंड भी न देना यह साबित करता है कि सरकार का ‘सबका साथ’ का नारा सिर्फ दिखावा है और इस बजट ने समाज के एक बड़े हिस्से को विकास की दौड़ से बाहर कर दिया है।

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